प्रीय महात्मा गांधी ! तेरे बचनों में था जोर

      (तर्ज: शांति कुणाला कशी लाभते...)
प्रीय महात्मा गांधी ! तेरे बचनों में था जोर ।
तपस्या थी तेरी घनघोर ।।
इसीलिए तो बढ गयी जनता बलिदानों की ओर ।
तपस्या थी तेरी घनघोर ।।टेक।।
ढूँढ निकाले लोग तुने, जो भारत के काबिल   थे ।
उन सारोंको हटा दिया, जो लडनेमें बुजदिल थे ।
इसीलिए सब हिलमिल थे ।।
सत्याग्रह से बढाया साहस, आजादी की ओर ।
तपस्या थी तेरी घनघोर 0।।१।।
ब्रिटिशों से सत्ता छीनी,सत्य-अहहिसा साधन से ।
प्रेम न उनका था तोडा, गुलामी तो  छोडी   उनसे ।
बडा कुशल तू था सबसे ।।
रामनाम से मोही जनता, शरमाये थे चोर ।
तपस्या थी तेरी घनघोर 0।।२।।
सब धर्मों का साथ लिया,जोभी मिले पकडे तूने ।
अल्ला-ईश्वर सार्थ कहा, आदर दे   जकडे  तूने ।
काम लिये सबसे अपने ।।
यहि इतिहास बडोंका होता, देखो  पिछली ठौर ।
तपस्या थी तेरी घनघोर 0 ।।३।।
लाज न थी तुझको आयी, पैसा माँगा   दर - दरपे ।
देशके खातिर लुटा दिया, कौडी ना रखली घरपे ।
इस कारण तू था सरपे ।।
कहता तुकड्या,बयालीस में सम्हले हम भी डोर ।
तपस्या थी तेरी घनघोर 0 ।।४।।