प्रिय गांधीका प्यार अनोखा
(तर्ज: रामभजनबिन को...)
प्रिय गांधीका प्यार अनोखा ।
मुग्ध हुआ, जिसने था देखा ।
आशा लगी हुई थी ।।टेक।।
कब देखें,प्रिय बापू । सब कहते प्रिय बापू !
बापू का दरबार खुला, जन अफाट ।
आशा लगी हुई थी 0।।१।।
चरखेकी,मधुर ध्वनी । दिल खींचे,बात दुनी ।
भारत की नरनारियों - का अधार ।
आशा लगी हुई थी 0।।२।।
पत्रों की, ढेर वहाँ । पढनेको, समय कहाँ ?
एकहि बात थी दिनरात, कर आजाद ।
आशा छगी हुई थी 0।।३।।
जब बापू चलते थे । सबके दिल खिलते थे ।
बच्चे साथ कंधे हाथ, थी कतार ।
आशा लगी हुई थी 0।।४।।
वीर कई, युवतियों । देने खडी, आहतियाँ ।
तुकड्याने यह देखा , प्रेमप्यार ।
आशा लगी हुई थी 0।।५।।