बापुने सुंदर कुटिया बनायी
(तर्ज: सच्चा धर्म नहिं जाना... )
सुंदर कुटिया बनायी,
बापुने सुन्दर कुटिया बनायी ।।टेक ।।
सेवाग्राम में आसन मारा, पिछडों को सुधराने ।
सबसे मिलते मैंने देखा, भारत मुक्त कराने ।।१।।
घासफूस, बाँसोंकी जाली, दर्भासन,खद्दर से ।
पवित्रताके आगे वैभव झुक जाता आदर से ।।२।।
देहाती का रहना वैसा गांधीजी का जीना ।
बडा काट-कसरी था,उनका हिसाब लेना-देना ।।३।।
एकबार तौलिया गुम गया, रंज वही करते थे ।
कितने दिन पुरता था गिनकर,नया नही फिर लेते।।४।।
बिना पत्रके भोजन कोई, देरीसे नहि पाना ।
तौल - तौल कर खाना उनका हाथ - पिसाई दाना ।।५।।
आसन जितना लगे बैठने, उतनाही फैलाना ।
शान-शौकिनी जरा नहीं थी,नहि था समय गमाना।।६।
अनुशासनमें शान्त मनोहर करे प्रार्थना मिलके ।
सब धर्मोकी बाणी पुकारे,गीता भी फिर झलके ।।७।।
बिन परिश्रम भोजन पाना, जरा नहीं चलता था ।
तुकड्यादास कहे मैने भी, चरखा ले सूत काँता ।।८।।