बनिया था गांधी हामारा

(तर्ज: रामभजन बिन को...)
बनिया ही था   गांधी   हमारा ।
हिसाब रखता रति-रति सारा ।
कौडी         नहीं         गुमाता ।।टेक।।
भीख मँगे, जगे-जगे । सब ले जो हाथ लगे ।
खर्च करे न छदाम, झूठे का ।
कौडी नहीं गुमाता ।।१।।
कपडा थी, छोटा था । खद्दर का खुद काँता ।
साफ रहे हाथ-धुला, धोबी को-
कौडी नहीं गुमाता ।।२।।
गादी भी थी छोटी । बैठें तो, छुप बैठी ।
चटाई के आसन थे, सिंदताड ।
कौडी नहीं गुमाता ।।३।।
भोजन भी,अल्प करे । हाथकुटा, नाज धरे ।
मिर्च नही नमक नही,सत्व सार ।
कोडी नहीं गुमाता ।।४।।
जरुरत को खर्च करे । फिर उसमें कुछ न डरे ।
तुकड्याने आँखों  देखा, त्याग यार !
कौडी नहीं गुमाता ।।५।।