निर्मल मन गांधीका, रे ! देखा
(तर्ज: सच्चा धरम नहि जाना...)
निर्मल मन गांधीका,
रे ! देखा, निर्मल मन गांधीका ।।टेक।।
करुणा मनमें हीनदीनोंकी, हरिजनसे बडी प्रीति ।
सच्चा भाव हृदयमें देखा, परमस्नेह की नीति ।।१।।
सब धर्मोसे प्रेम परन्तु, हिन्दु धर्म नहि छोडा ।
अपने पुत्र के धर्मान्तर को पागलपन कह मोडा ।।२।।
कितनी बार समझ दी सबको- अपना धर्म निभाना ।
कौडीखातिर धर्म बदलना,नहि इन्सानका बाना ।।३।।
हिन्दी भाई खत अंग्रेजी लिख दे, बापू बाँचे ।
उससे बोले हिन्दी आकर क्यों इंग्लिश में नाचे ? ।।४।।
अंग्रेजोंसे खुलकर लड़ते न्यायनीति के पथ से ।
कहते थे हूँ मित्र उन्हींका, करूँ भलाई व्रत से ।।५।।
नेताजी के क्रान्तिमार्ग से दूर सदा मन भा गा ।
पर कहते गर सफल बनोगे,पहले धन्य कहूँगा ।।६।।
मै सच्चा हिन्दू हूँ कहकर इश्वर- अल्ला गावे ।
स्वधर्म का मतलब नहि होता परधमोंको सतावे ।।७।।
भारत सब धर्मोका प्यारा, सब आकर रह जायें ।
तुकड्यादास कहे हम मिलकर बेडा पार करायें ।।८।।