मन कदम-कदम पर रोके, सत्संग करे न किसीके
(तर्ज : गुरूदेव हमारा प्यारा...)
मन कदम -कदम पर रोके, सत्संग करे न किसीके ।।टेक।।
अपनी टेर सुनावे ज्यादा, करता है विषयोंकी बाधा ।
चाहे कितनी बार भी घोके ।। सत्संग करे0।।1।।
मंगल तो भावे नहिं उसको, बूरी बात सोचता जसको।
है तनमें भूत सरीखे।। सत्संग करे0 ।।2।।
इसके पिछूँ सब गुट जावे, काम-क्रोध और दंभ सतावे।
सत्कार्य करे सब फीके।। सत्संग करे0।।3।।
तुकड्यादास कहे क्या करना, सतसंगत-बिनु नहीं सुधरना।
सुनो, यहि साधन है इसके ।। सत्संग करे 0।।4।।