नहि हूँ मैं गांधी का चेला, ना लूँ किसका पक्ष
(तर्ज: शांति कुणाला कशी लाभते...)
नहि हूँ मैं गांधी का चेला, ना लूँ किसका पक्ष ।
मेरा तो हरि-भजनों में लक्ष ।।
जो मुझ से कुछ कहना चाहें,सुनलें मेरी साक्ष । मेरा तो0 ।।टेक।।
बापूने जब प्रेम किया,भक्ति-भजनको सुनकरके ।
मैं तो रोज सुनाता था, आयी लहरसे जी भरके ।।
बरखा भजन नये करके ।
प्रसन्नतासे उनके दिलके खुलते थे सब कक्ष । मेरा तो 0।।१।।
सेवाग्राम की झोपडिया,उन्ही दिनों बस एकही थी ।
हम दोनों रहते थे वहीं,कस्तुरबा नजदीक ही थी ।।
सात्विक थी वह देवी सती ।
बडे बड़े सब लोग बापूसे मिलते मेरे समक्ष । मेरा तो0 ।।२।।
मोम भी था दिलका बापू, वज्रसमान कठोर भी था ।
चुगलीखोर का था द्वेषी, सच्चे का चितचोर भी था ।।
हरपल को तैयार भी था ।
तुकड्यादास कहे वह पाया सेवा करके मोक्ष । मेरा तो0 ।।5।।