पहले हि रँगा था वस्त्र मेरा

पहले हि रँगा था वस्त्र मेरा, फिर क्या था लाभ रँगानेसे ?
पहलेहि बना था दिल पागल, प्रभुके भजनों को गानेसे ।।टेक।।
यह विश्व मेरा मन्दिरहि  रहा,
और मानव था भगवान यहाँ ।
उसकी सेवा का धन पाया,गुरु आडकुजी के बानेसे ।। १।।
तब दूध में शक्कर और पड़ी,
जंगल में गया एकान्त किया । 
कहिं शेर और रीछ के बीच रहा,डर थाहि नही रंग पानेसे ।।२।।
इसका कारण   था  सन्तदया,
और त्यागकी कफनी थी तनमें ।
अनुभव की बूटी पी करके,रहते थे मस्त जमानेसे ।।३।।
कइ सन्त मिले, कइ पंथ मिले,
भजनोंमें जन-मन-भेद   खुले ।
मुझ पागल को अपनाते सभी,मिले गांधी इसहि बहानेसे ।।४।।
प्रिय गांधीने पकड़ा था मुझे,
किसिके कहने और सुननेपर । 
तुकड्या कहे फिर पहिचान हुई,उस सेवाग्राममें जानेसे ।।५।।