मैं गांधीजी का नहि शिष्य रहा

            (तर्ज: दिलमेंहि नहीं जब शांति...)
मैं गांधीजी का नहि शिष्य रहा, ना गांधी मेरे कहिं भक्त रहे ।
पर प्रेम था हम दोनोंमे बडा,वह मिट न सका,कोई लाख कहे ।।टेक।।
हम मानवता के पहले ही,
दोनों थे पुजारी अपने में ।
जब भेंट हुई प्रिय गांधीसे, वे भजन सुने अलमस्त हुए ।।१।।
सेवाही हमारा मकसद था,
जो बचपनसेहि रहा मुझमें । 
मैं जंगल-जंगल घुमता था, गुरु आडकुजी जब छोड गये ।।२।।
अध्यात्महि मेरा जीवन था,
और गांधीका भी लक्ष्य वही ।
जन-जीवनको सुधराने की,थी एक लगन,फिर क्यों न चहें ? ।।३।।
कुछ दिन हम दोनों साथ रहे,
जब सेवाग्राम में बापू थे । 
हररोज लिखी बरखा मैने, गांधीजी सुन तल्लीन भये ।।४।।
उनके गौरव और सेवाका,
मुझको तो सदा आदर हि रहा ।
तुकड्या कहे मुझ जैसे पागलपर, प्रिय गांधीने खुब प्रेम किये ।।५।।