प्रेम नही ईश्वरपर किसका, ये है स्वारथा साथी

      (तर्ज: डमडम डमडम डमरू बाजे.. )
प्रेम नही ईश्वरपर किसका, ये है स्वारथ साथी ।
           पढ़ते मतलब की पोथी ।।टेक।। 
ऐसे साधू घर-घर फिरते, खाते - पीते - सोते ।
जिसके घरमें जाते उसको नागानीहि सताते ।।
भोले भाले घरबारी   भी   डरते   है   हरभाँति ।।१।।
बडप्पना को मरते हरदम,काम नही कुछ करते ।
साथी को भी सता-सताकर, अपनी जेबें भरते ।।
ऐसे कामी नरके घरकी इज़त  आखिर  रोती  ।।२।।
पूज्य महात्मा गांधीने जब ऐसी बात सुनायी ।
हमने कहा कि साधु भेष में कई रहते हैं कसाई ।।
तुकड्यादास कहे बिन प्रीती क्यों आयेगी नीति ?।।३।।