प्रभु सुमरण में नहिं शरमाना !

(तर्ज : भाग्य कुणाला लाभे ऐसे... )

प्रभु सुमरण में नहिं शरमाना !
यहि है सब सन्तों का कहना।।टेक।।
इस कलजुग में योग न बनता ।
यज्ञ न बनता, तप नहिं बनता।।
नहिं पूजा, आचार भि बनता ।
ऐसा   आया, अजब     जमाना  ।।1।।
राम-राम -कहना   सब  भूला।
सब चाहते, रोटी और चूल्हा! !
मित्र मिलेपर भी नहीं नमते ।
हँस -हँस कहते,क्या बतलाना ?।।2।।
राम-नाम  की    महिमा भारी ।
सुमरण करता है त्रिपुरारी ! !
हम भी अपनी रखें जबॉपर-।
चाहते   जब   जीवन  उद्धरना ।।3।।
जिसने नाम जपा मुख-माँही।
उसको दुनियाँ में दुख नाही।।
तुकड्यादास कहे, निर्मल मन।
होकर  गावो,  चतुर - सुजाना ।।4।।