मन रे ! पढ हरि - नाम की गीता !

(तर्ज : विसरुनका प्रभु नामा....)

मन रे ! पढ़ हरि-नाम की गीता !
पल - पल      जाता        बीता  ।।टेक ।।
जिसके बलपर बल करता है।
वह संसार फजीता ! ।। मन रे ! पढ0।।1।।
यह दिन फेर मिले नहिं दूजो।
काहेको बखत गमाता ? मन रे ! पढ0।।2।।
सयम से जी ,बना अपना तब -
लगे   प्रभूसे     नाता  ।। मन रे ! पढ0 ।।3।।
मत कर द्वेष किसीसे जग में ।
सब है प्रभू की    सत्ता।। मनरे ! पढ़ 0 ।।4।।
हम है एक निमित्त दुनियाँ में ।
सब है   राम  चलाता।। मन रे ! पढ़ 0।।5।।
तुकड्यादास कहे, सुन मेरी ।
क्यों  नाहक  भरमाता ? मन रे ! पढ0।।6।।