मोरे मन तुम्हींके चरण लाग रखोजी
(तर्ज : मोहे पनघटपे नंद्लाल... )
मोरे मन तुम्हीं के चरण लाग रखोजी ।
तबही कठिन संकट में जाय सकोजी ।।टेक।।
पलपल भी भटकत है, दंभ-मोह चटकत है ।
विषय-संग अटकत है ।।
इसी कारण बोलत हूँ,अब न दुखोजी ।।मोरे0।।1।।
निश्चय नहीं दे टिकात, ऊठ-ऊठ दौर जात।
पर-जन-मन दुखात ।।
कितनी बार रोकूं,फिर भी विषय चखोजी।।मोरे 0।।2।।
अपनों के घर न परे, पर-घर को जाय मरे।
सुधराय नहीं सुधरे ।।
तुकड्या कहे, सत्गुरुबिन, कौन जगोजी ?।। मोरे0।।3 ।।