देखि किर्ति माल लेके हाथ घूम यही है
(तर्ज : मोहे पनघटपे नंदलाल....)
देखि कीर्ति माल लेके हाथ घूम रही है ।
अबतलक के ब्याहि नहीं, बात सही है ! ।।टेक।।
मूर्ख उसे चाहते हैं, पर न वो उसे ब्याहे ।
पलट-पलट घुम जाये ।।
सज्जनको चाहती, उसे चाह नहीं है ! ।। देखि0।।1।।
साधु उसे दूर करे, भोंदु ही पीछे परे।
वो न उसकी बाह धरे ।।
इसही तह्रा वो कभी भी ब्याहि नहीं है !।। देखि0।।2।।
चाहे नहीं सजन भी,पर न उसे छोड़े कभी ।
चाहे जाये जीवन भी ।।
तुकड्या कहे,बिन माँगे भेजी गयी है !।। देखि 0।।3।।