मोरे हाथ पकड नाथ, त्रिकुट घाट गयो रे
(तर्ज : मोहे पनघट पें नंदछाल छेड गयो रे...)
मोरे हाथ पकड नाथ, त्रिकुट घाट गयो रे ।
जहाँ सुन्दर थी सेजपे निवास कियो रे ! ।।टेक।।
द्विदल के चक्र लगे, भ्रमर-गुंफासे बिलगे।
दंभ -दर्प जाय भगे।।
मोहनी स्वरूप प्रेम बाँध लियो रे ।। मोरे0 ।।1।।
अनहद की बीन बजी, अति मधुर सुंदर थी ।
मस्त भई दिल भर थी ।।
छाई नशा घोर, बडा शोर भयो रे ॥ मोरे0।।2।।
संत समागम ही मिला, जीवनका फूल खिला।
सत्गुरु से हाथ दिला ।।
तुकड्याकी प्रेम -भक्ति,रास भयो रे।। मोरे0।।3।।