बिना भेखका साधू,गांधीजी बिना भेख का साधू
(तर्ज: सच्चा धरम नहि जाना...)
बिना भेखका साधू,
गांधीजी बिना भेख का साधू ।।टेक।।
घुटनेभर तो खद्दर पहने, अंग सदाही खूला ।
लकडी के थे पाँव खडाऊ, तकली -चरखेवाला ।।१।।
सत्य -अहिंसा ब्रत था उसका,रहनी से था त्यागी ।
देशके खातिर माँगे चुँगी, दीनों का अनुरागी ।।२।।
जोभी मिले अति प्रेमसे बोले,सबही अपने जाने ।
बिन खद्दर के जो दिखता हो,खडा रहे समझाने ।।३।।
गरिबोंकी रोटी है खादी, क्यों न इसे अपनाओ ।
दूजा साधन हो गर कोई, कहे हमें समझाओ ।।४।।
अपने घरमें यन्त्र बनें जब, मैं हूँ उनका साथी ।
विदेश का यह जाल हटाओ,कौन रखेगा हाथी ?।।५।।
सेवामय था जीवन उसका, निसर्ग से थी प्रीति ।
साधन शुध्दि सदा प्यारी थी,सभी क्षेत्रमें नीति ।।६।।
निर्भयता से खुली तौरपर, अपने दोष बतावे ।
पहाड़ भी हो पडा सीसपर, जरा नही डिंग जावे ।।७।।
बिना प्रार्थना रहे न एकदिन, चाहे दिक्कत आवे ।
तुकड्यादास कहे वह दिलमें, रामनाम ही गावे ।।८।।