प्रिय महात्मा ! तूहि था भारत का सच्चा जौहरी

            (तर्ज: हर जगह की रोशनी में ... ) 
प्रिय महात्मा ! तूहि था भारत का सच्चा जौहरी ।
तूनेहि परखे देशके जो मूल्य थे सब आखरी ।।टेक।।
सत्यही ढूँढा तुने   करके   अहिंसा - साधना ।
त्याग-भूषण की  बनायी  माल, पहनी  कामरी ।।१।।
ब्रह्माचर्यादि  ब्रतोंसे, मोह डाला   शत्रुको ।
अस्तेय मन उस ब्रह्ममें,रखके बजायी  बाँसुरी ।।२।।
सब मेरे- मैं हूँ सभीका,जीव-शिव नहि भिन्न है ।
सिध्दान्त दुनिया को दिया,पूरी फकीरी थी तेरी ।।३।।
रामनाम की धून भरायी रामराज्य की राहमें ।
जो भी हो अपनी  तुने   पूरी   करा  दी   चाकरीं ।।४।।
अखिल मानव की भलाई को तुने अपना  लिया ।
कहत तुकड्यादास अबतक गूंजती तेरी वैखरी।।५।।